इयत्ता - दहावी
विषय - हिंदी
पहली इकाई -
पद्य क्र .1 भारत महिमा
रचनाकार - जयशंकर प्रसाद
संकलन एवं निर्मिति : डी. पी. सुतार
आदर्श प्रशाला, कोल्हापूर भ्रमणध्वनि : WP 9822206921
भावार्थ को छात्र आसानी से समझ सके, ऐसी आसान भाषा में दिया गया है ।
शब्दार्थ :
उपहार - भेंट उषा - सुबह लोक - विश्व, दुनिया आलोक - प्रकाश
व्योमतम - अंधकाररूपी आकाश पुंज - समूह, राशि
अखिल - पूरी तरह से, संपूर्ण संसृति - संसार, दुनिया
अशोक - शोक(दुख )रहित विमल - निर्मल, साफ वाणी - स्वर, वचन
कमल - एक फूल कोमल - मुलायम, नाजुक कर - हाथ
सप्रीत - प्रीत (प्रेम) के साथ
सप्तस्वर - सात स्वर - षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत व निषाद।
सप्तसिंधु - प्राचीन आर्यावर्त की प्रसिद्ध सात नदियाँ, सिंधु, परुष्णी (रावी), शतुद्री (सतलज), वितस्ता (झेलम), सरस्वती, यमुना और गंगा।
साम - एक वेद, इस वेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है।
धरा - धरती, पृथ्वी घूम - घुमना, यात्रा करना दया - करूणा, रहम
गोरी - पूरा नाम - शहाबउद्दीन मुहम्मद ग़ोरी ; 12वीं शताब्दी का अफ़ग़ान योद्धा था, जो ग़ज़नी साम्राज्य के अधीन ग़ोर नामक राज्य का शासक था।
स्वर्ण भूमि - देश - बर्मा अर्थात ब्रहमदेश शील - नैतिक आचरण और व्यवहार
सिंहल - एक देश - श्रीलंका सृष्टि - निर्माण, रचना प्रकृति - कुदरत
पालना - पालन- पोषण करना जन्मभूमि - वह स्थान जहाँ जन्म हुआ हो ।
पूत - पुत्र भुजा - बाहु , बाँह विपन्न - निर्धन, गरीब
संचय - इकट्ठा करना दान - देन, खैरात अतिथि - मेहमान
टेव - आदत दिव्य - तेज
आर्य - आर्य एक शब्द है । जिसका उपयोग आर्यावर्त प्राचीन अखंड भारत के लोगों द्वारा स्व-पदनाम के रूप में किया गया था। इस शब्द का इस्तेमाल भारत में वैदिक काल के भारतीय लोगों द्वारा एक जातीय लेबल के रूप में किया गया था।
हर्ष - खुशी, प्रसन्नता
निछावर करना - समर्पित करना ।
हमारे देश की आजादी के लिए कई वीरों ने अपनों प्राणों को निछावर कर दिया ।
सर्वस्व - सबकुछ भारतवर्ष - भारत का एक प्राचीन नाम
सरल अर्थ :
सुबह सूरज की किरणें भारत के हिमालय पर्वत पर पड़ती हैं तब ऐसा लगता है कि हिमालय को किरणों का उपहार मिला है । ऐसा प्रतीत होता है कि उषा भारत भूमि का अभिनंदन कर रही है और उसे हीरों का हार पहना रही हो ।
सर्वप्रथम भारत में ही ज्ञान का उदय हुआ था । विश्व में सबसे पहले हम भारतवासी जागृत हुई और उसके बाद विश्व जागृत हुआ । इस ज्ञान से सारा विश्व प्रकाशित हो उठा । अंधकार रूपी अज्ञान का विनाश हुआ और दुनिया से शोक ( दुख ) खत्म हुआ ।
वाणी की देवी साक्षात सरस्वती ने इस भूमि पर अपने हाथों से वीणा उठाई । उसकी मोहक वाणी से सप्तसिंधु में सात स्वरों की महक गूँजने लगी । इसी देश में सामवेद की रचना हुई ।
इसी भारत देश में जो बड़े प्रशासक थे उन्होंने केवल लोहे से बने शास्त्रों के आधार पर विजय प्राप्त नहीं की । इसी देश में धर्म के प्रति आस्था थी । गौतम बुद्ध वर्धमान महावीर जैसे महापुरुषों ने अपना विशाल साम्राज्य छोड़कर भिक्षु का रूप धारण किया और घर-घर जाकर लोगों का कष्ट दूर किया । सम्राट अशोक ने भी अपने पुत्र तथा पुत्री को बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए श्रीलंका भेजा था ।
हमारे भारत देश में मोहम्मद गोरी पर जीत हासिल करने के बावजूद भी उसके साथ अन्याय नहीं किया गया । उसे दयापूर्वक क्षमा कर दिया । भारत देश से ही चीन को भी धर्म की दृष्टि मिली है । हमारे भारत देश से ही ब्रह्मदेश और श्रीलंका इन देशों को पंचशील अर्थात सत्य,अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य ये सिद्धांत मिले।
भारत देश ने किसी का साम्राज्य या संपत्ति को छिना नहीं । प्रकृति की कृपा हमेशा हमारे देश पर बनी रही ।
यही हमारी जन्मभूमि थी, हम कहीं से आए नहीं थे ।
हम लोग सदा से ही चरित्रवान रहे हैं । हमारी भुजाओं में प्रचंड शक्ति है, इसके बावजूद हमारे पास नम्रता है । हमारी संस्कृति के प्रति हमें गर्व है । हम किसी को निर्धन या दुखी देख नहीं सकते ।
हम धन का संचय करते हैं, पर उसका उपयोग दान के लिए करते हैं । हम अतिथियों को देवता के समान मानते हैं । हमारी वचन में सत्यता और हृदय में तेज है । हम अपनी प्रतिज्ञा पर अटल रहते हैं ।
आज भी हमारे अंदर अपने पूर्वजों का खून बह रहा है । आज भी हमारे देश में वही साहस, वही ज्ञान, वही शांति और शक्ति भी है । हम महान आर्यों की संताने हैं ।
हम हमेशा अपने देश के लिए ही जिएँगे । यहाँ की सभ्यता और संस्कृति पर हमें गर्व है । इस प्यारे भारतवर्ष पर हम अपना सर्वस्व निछावर कर सकते हैं ।
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